मच्छर का एक डंक बना सकता है रोगी, रहें अलर्ट - Health Care Tips Hindi
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मच्छर का एक डंक बना सकता है रोगी, रहें अलर्ट

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03 अवस्थाएं हैं डेंगू की- क्लासिकल, हेमरेजिक फीवर और शॉकिंग सिंड्रोम।
48 घंटे बाद (काटने के) महसूस होने लगते मच्छर जनित रोग के लक्षण।
4.5 लाख लोगों की मृत्यु सालाना मलेरिया बीमारी से विश्व में होती है।
50 % लोगों में पूर्ण इलाज न लेने से रोग लौट सकता है।
कई हैं प्रजाति ...
वैसे तो मच्छरों की कई प्रजातियां मौजूद हैं लेकिन भारत में कुछ प्रमुख प्रजातियां ही रोगों को फैलाती हैं। इसमें एनाफिलीज, एडीज और क्यूलेक्स प्रकार के मच्छर रोगों के वाहक हैं। मलेरिया मच्छर की दो प्रमुख प्रजाति में वाइवेक्स से ज्यादा फैल्सिपेरम खतरनाक और जानलेवा होता है। ये किडनी, लिवर आदि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
टाइगर मॉस्किटो (डेंगू)

डेंगू यानी हड्डीतोड़ बुखार एडीज मच्छर के काटने से होता है। इसमें कमर में तेज दर्द, आंखों के ऊपरी हिस्से में दर्द और गंभीर रूप होने पर प्लेटलेट्स घटने लगती है। गंभीर अवस्था में डेंगू स्ट्रोक सिंड्रोम होता है।
चिकनगुनिया
एडीज इजिप्टी से यह फैलता है। इसका वाहक भी डेंगू मच्छर ही है। अंतर केवल इतना है कि इसमें शरीर के प्रमुख जोड़ों में दर्द होता है। मच्छर के काटने के ४-७ दिन बाद जोड़ों में दर्द व सूजन, तेज बुखार व मसल्स पेन होता है।
हर्बल पौधे भगाएंगे मच्छर
मच्छरों से बचाव के लिए नीम, नीलगिरी व लेमनग्रास का तेल, स्प्रे व रोलर त्वचा पर लगा सकते हैं। घर में इंडोर पौधे जैसे तुलसी, लेवेंडर, लेमनग्रास, पिपरमिंट, गेंदा रखें। गुलमेहंदी की सूखी पत्तियां जलाएं।
लापरवाही से बढ़ सकती परेशानी
म लेरिया मच्छर प्लाजमोडियम परजीवी का होता है। इसका वाहक मादा एनाफिलीज होता है। ये शाम के समय 5-7 बजे के बीच ज्यादा सक्रिय होते हैं। इसकी फैल्सिपेरम प्रजाति सीधे लाल रुधिर कोशिकाओं पर असर करती हैं। इसके काटने के 48 घंटों बाद से सर्दी लगकर बुखार आने, तिल्ली बढऩे, पीलिया जैसे लक्षण सामने आते हैं। वहीं वाइवेक्स प्रजाति का मच्छर साफ पानी में पनपता है। ये दीवारों पर ज्यादा बैठते हैं। इसमें सिरदर्द, बुखार और पीलिया के लक्षण ज्यादा सामने आते हैं।
अलर्ट : तेज बुखार, यूरिन का रंग बदले, तेज सिरदर्द, आंखों का रंग पीला पडऩा जैसे लक्षण हों तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। लापरवाही से मल्टीऑर्गन फैल्योर (प्रमुख रूप से लिवर व किडनी पर असर) और ब्लैक वॉटर फीवर यानी काले रंग का यूरिन आ सकता है। साथ ही मस्तिष्क तक असर होने पर सेरेब्रल मलेरिया की स्थिति बन जाती है। जिसमें मरीज को बेहोशी आती है और वह कोमा में भी जा सकता है।
जांच व इलाज : कार्ड टेस्ट, थिक एंड थिन ब्लड टेस्ट आदि से जीवाणु का पता कर इलाज के तहत दवा देते हैं।
एक्सपर्ट : डॉ. नवीन किशोरिया, सी. प्रो. (मेडिसिन), डॉ एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर
एक्सपर्ट : डॉ. सर्वेश अग्रवाल, आयुर्वेद विशेषज्ञ, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर

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