सफेद दाग एक ऑटो इम्यून डिजीज है, जाने कैसे होगा बचाव - Health Care Tips Hindi

सफेद दाग एक ऑटो इम्यून डिजीज है, जाने कैसे होगा बचाव

विटिलिगो यानी सफेद दाग एक दीर्घकालिक समस्या है जिसमें त्वचा के बढ़ते पैच अपना रंग खो देते हैं। यह किसी भी उम्र के लोगों को प्रभावित कर सकता है। विटिलिगो (ल्यूकोडर्मा) एक प्रकार का त्वचा रोग है। दुनिया भर की लगभग 0.5 प्रतिशत से एक प्रतिशत आबादी विटिलिगो से प्रभावित है, लेकिन भारत में इससे प्रभावित लोगों की संख्या लगभग 8.8 प्रतिशत है। पैच तब दिखाई देते हैं जब त्वचा के भीतर मेलेनोसाइट्स कलर बनाना बंद हो जाता है । मेलानोसाइट्स त्वचा के रंगद्रव्य, मेलेनिन के उत्पादन के लिए जिम्मेदार कोशिकाएं हैं, जो त्वचा को अपना रंग देती हैं और इसे सूरज की यूवी किरणों से बचाती हैं। विटिलिगो से प्रभावित होने वाली त्वचा का कुल क्षेत्र व्यक्तियों के बीच भिन्न होता है। यह आंखों, मुंह के अंदर और बालों को भी प्रभावित कर सकता है।
सफेद दाग क्या है
यह एक ऑटो इम्यून डिजीज है, जिसमें व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता उसकी त्वचा को नुकसान पहुंचाने लगती है। यह शरीर के इम्यून सिस्टम की कार्य प्रणाली में होने वाली गड़बड़ी का परिणाम है। ऐसी स्थिति में त्वचा की रंगत निर्धारित करने वाले मेलेनोसाइट्स नामक सेल्स रंग बनाना बंद कर देती हैं, नतीजतन त्वचा पर सफेद धब्बे नज़र आने लगते हैं। आमतौर पर यह समस्या होंठों और हाथ-पैरों पर दिखाई देती है। इसके अलावा शरीर के कई अलग-अलग हिस्सों पर भी ऐसे दाग नज़र आ सकते हैं।

क्यों होता है सफ़ेद दाग
विटिलिगो के होने का कारण अभी तक पहचाना नही जा सका हालांकि पर्यावरण एवं अनुवांशिकी कारण मन जाता है सफेद दाग क्या है | आनुवंशिकता, अर्थात अगर माता-पिता को यह डिज़ीज़ हो तो बच्चों में भी इसकी आशंका बढ़ जाती है। हालांकि ज़रूरी नहीं है कि इससे पीड़ित हर व्यक्ति की संतान को भी ऐसी समस्या हो। 30 % मामलों में प्रभावित मरीज के किसी भी रिश्तेदार के पीड़ित होने का पता चलता है सफेद दाग से प्रभावित व्यक्ति के बच्चों को 50% खतरा होता है।

सच और मिथक
विटिलिगो के बारे में भारतीय समाज में कई तरह की ऐसी भ्रामक धारणाएं प्रचलित हैं, जो पूरी तरह निराधार हैं। आइए जानें कुछ ऐसी ही भ्रांतियों के बारे में जो इससे पीड़ित व्यक्तियों के लिए परेशानी का सबब बन जाती हैं।त्वचा संबंधी अन्य बीमारियों की तरह सफेद दाग भी एक ऐसी स्किन डिजीज़ है, जिसका उपचार संभव है। यह समस्या किसी को भी हो सकती है। इसलिए इसे पूर्वजन्म के बुरे कर्मों का फल समझना गलत है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह धारणा तथ्यहीन है कि मछली खाने के बाद मिल्क प्रोडक्ट्स का सेवन करने से यह समस्या होती है। कुछ लोग इसे कुष्ठ रोग यानी लेप्रेसी की शुरुआती अवस्था मानकर इससे बहुत ज्य़ादा भयभीत हो जाते हैं पर वास्तव में ऐसा नहीं है। लेप्रेसी से इसका कोई संबंध नहीं है। इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि यह स्किन कैंसर का शुरुआती लक्षण है और इससे व्यक्ति की जान भी जा सकती है। यह धारणा पूरी तरह गलत है। यह बीमारी कैंसर से बिलकुल अलग है और इससे मरीज़ की जान को कोई खतरा नहीं होता। सबसे दुखद बात यह है कि कुछ लोग इसे संक्रामक रोग समझकर इसके मरीज़ों के साथ अछूतों जैसा व्यवहार करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यह रोग किसी भी दृष्टि से संक्रामक नहीं है। इसके मरीज़ों की त्वचा के स्पर्श या उनके साथ खाने-पीने से दूसरे व्यक्ति तक इसका संक्रमण नहीं पहुंचता। इसलिए इस बीमारी से पीडि़त लोगों को खुद से अलग न समझें और उनके साथ सहज व्यवहार करें।

क्या है इसका इलाज
इसका इलाज दवाइयों के साथ कुछ सर्जरी भी है जैसे स्किन ग्राफ्टिंग, फोटो थेरेपी, शक्शन ब्लिस्टर, मेलेनोसाइड एपिडर्मल और यूवी अल्ट्रावायलेट आदि | इसके उपचार के लिए स्किन ग्राफ्टिंग की तकनीक अपनाई जाती है। इसमें किसी एक जगह की त्वचा को निकालकर दाग वाले हिस्से पर लगाया जाता है, जिससे दाग छिप जाते हैं। फोटो थेरेपी विधि द्वारा सूरज की यूवीए और यूवी अल्ट्रावॉयलेट किरणों की मदद से त्वचा की रंगत दोबारा वापस लौटाने की कोशिश की जाती है। इसमें मरीज़ को काला चश्मा पहनने को दिया जाता है, ताकि उसकी आंखों को सूर्य की किरणों से नुकसान न पहुंचे। प्रभावित हिस्से पर खास तरह का लोशन लगाने के बाद मरीज़ को रोज़ाना सुबह 11 से 12 बजे के बीच धूप में बैठने को कहा जाता है। इन तरीकों से दाग को शुरुआती दौर में नियंत्रित करना आसान होता है। अगर किसी को लगता है कि उसे सफ़ेद दाग है तो झोला छाप डॉक्टर को दिखने की जगह स्किन स्पेशलिस्ट को दिखाएं ।
डॉ. संजय पंचोली, स्किन स्पेशलिस्ट

 



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